
देश की सबसे आधुनिक और प्रीमियम ट्रेनों में शुमार ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, आम यात्रियों को लगता है कि इन ट्रेनों का मालिकाना हक सीधे भारतीय रेलवे के पास है, लेकिन तकनीकी और कानूनी रूप से इसकी सच्चाई कुछ और है। दरअसल, वंदे भारत ट्रेनों का असली मालिक भारतीय रेलवे नहीं, बल्कि इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC) है।
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क्यों रेलवे को देना पड़ता है ‘किराया’?
वंदे भारत जैसी हाई-टेक ट्रेनों को बनाने में भारी निवेश की जरूरत होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक वंदे भारत रैक की लागत लगभग ₹115 करोड़ आती है। रेलवे के पास एक साथ इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बजाय एक खास वित्तीय मॉडल अपनाया जाता है:
- फंडिंग का स्रोत: IRFC बाजार से बॉन्ड और डिबेंचर के जरिए पैसा जुटाता है और इसी फंड से वंदे भारत के कोच और रैक तैयार किए जाते हैं।
- लीज मॉडल: निर्माण के बाद, IRFC इन ट्रेनों को भारतीय रेलवे को 30 साल की लंबी अवधि के लिए लीज (किराया) पर दे देता है।
- सालाना भुगतान: इसके बदले में, भारतीय रेलवे हर साल IRFC को “लीज रेंटल” के रूप में मोटी रकम चुकाता है। वित्त वर्ष 2023-24 में, रेलवे ने कुल ₹30,154 करोड़ का भुगतान किया, जिसमें ₹17,000 करोड़ मूलधन और लगभग ₹13,000 करोड़ ब्याज शामिल था।
सिर्फ वंदे भारत ही नहीं, 80% ट्रेनों का यही हाल
चौंकाने वाली बात यह है कि वंदे भारत के अलावा शताब्दी, राजधानी और मालगाड़ियों के लगभग 80% इंजन और कोच पर IRFC का ही मालिकाना हक है। रेलवे केवल इनका परिचालन (operation) करता है, जबकि संपत्तियां IRFC के नाम पर रहती हैं।
इस मॉडल से क्या है फायदा?
विशेषज्ञों के अनुसार, इस मॉडल से भारतीय रेलवे पर एक साथ वित्तीय बोझ नहीं पड़ता। रेलवे परिचालन से होने वाली कमाई से धीरे-धीरे IRFC का बकाया चुकाता रहता है, जिससे रेलवे के आधुनिकीकरण और नए ट्रैक बिछाने जैसे प्रोजेक्ट्स में तेजी आती है।
















