
हिंदू परिवारों में संपत्ति विवाद के एक पेचीदा मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है अदालत ने साफ किया है कि यदि कोई निसंतान हिंदू महिला बिना वसीयत किए (Intestate) मर जाती है, तो उसकी संपत्ति पर उसके ससुराल पक्ष (पति के वारिसों) का पहला हक होगा, न कि उसके मायके (माता-पिता) का।
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गोत्र परिवर्तन और सामाजिक ढांचा मुख्य आधार
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की बेंच ने इस मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू परंपराओं का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि:
- गोत्र में बदलाव: हिंदू समाज में ‘कन्यादान’ की रस्म के बाद महिला का गोत्र बदलकर पति का गोत्र हो जाता है। वह अपने पति के परिवार का अभिन्न हिस्सा बन जाती है।
- ससुराल की जिम्मेदारी: विवाह के बाद महिला की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी पति के परिवार की होती है, इसलिए संपत्ति का उत्तराधिकार भी उसी परिवार को जाता है।
कानून क्या कहता है? (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15)
अदालत ने अधिनियम की धारा 15 के प्रावधानों को रेखांकित किया:
- सामान्य नियम: धारा 15(1) के तहत, यदि महिला के बच्चे या पति नहीं हैं, तो संपत्ति पति के वारिसों को मिलेगी。
- संपत्ति का स्रोत: यदि महिला को संपत्ति उसके ससुर या पति से मिली थी, तो वह वापस पति के वारिसों को जाएगी। हालांकि, यदि उसे संपत्ति अपने माता-पिता से विरासत में मिली थी, तो वह उसके पिता के वारिसों (मायके) को वापस मिल सकती है。
विधवा बहू के लिए राहत: ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण
जनवरी 2026 के एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एक विधवा बहू अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की हकदार है। कोर्ट ने कहा कि भले ही बहू अपने मायके में रह रही हो, लेकिन यदि वह अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं है, तो ससुर के वारिसों को उसे गुजारा भत्ता देना होगा।
विवादों से बचने के लिए ‘वसीयत’ जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हिंदू महिलाओं, विशेष रूप से निसंतान महिलाओं को सलाह दी है कि वे अपनी संपत्ति के लिए वसीयत (Will) जरूर लिखें। वसीयत होने की स्थिति में, संपत्ति महिला की इच्छा के अनुसार किसी को भी दी जा सकती है, जिससे ससुराल और मायके के बीच होने वाले लंबे कानूनी विवादों को टाला जा सकता है।















