
शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पाठ्यक्रम को समय पर पूरा करने के उद्देश्य से स्कूल की छुट्टियों के कैलेंडर में एक बड़ा फेरबदल किया गया है, नए नियमों के लागू होने के बाद, इस साल छात्रों और शिक्षकों को मिलने वाली छुट्टियों में 16 दिनों की भारी कटौती की गई है, सरकार के इस फैसले का मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के मानकों के अनुरूप शैक्षणिक सत्र में न्यूनतम 200 कार्य दिवसों को सुनिश्चित करना है।
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क्यों बदला छुट्टियों का गणित?
शिक्षा विभाग के नए प्रस्ताव के अनुसार, अब तक स्कूलों में मिलने वाली लंबी छुट्टियों की अवधि को घटा दिया गया है, पहले जहां मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए छुट्टियों के अलग-अलग मानक थे, वहीं अब पूरे राज्य के लिए एक ‘समान कैलेंडर’ लागू करने की तैयारी है, विभाग का मानना है कि छुट्टियों में सामंजस्य बैठने से न केवल पढ़ाई के दिनों में बढ़ोतरी होगी, बल्कि परीक्षाओं का संचालन भी बेहतर ढंग से हो सकेगा।
नया प्रस्तावित कैलेंडर: एक नज़र में
नए प्रस्ताव के तहत साल भर की कुल 48 दिनों की लंबी छुट्टियों (दीर्घकालीन अवकाश) को घटाकर अब मात्र 32 दिन कर दिया गया है, मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं:
- गर्मी की छुट्टियां (Summer Vacation): अब सभी स्कूलों में 15 जून से 30 जून तक केवल 16 दिन का ग्रीष्मकालीन अवकाश रहेगा।
- सर्दी की छुट्टियां (Winter Vacation): शीतकालीन अवकाश के लिए भी 1 जनवरी से 16 जनवरी तक का समय तय किया गया है, यानी यहाँ भी केवल 16 दिन की छुट्टी मिलेगी।
- मैदानी बनाम पहाड़ी क्षेत्र: पहले ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सर्दियों में 37 दिन और मैदानी इलाकों में गर्मियों में 35 दिन की छुट्टियां मिलती थीं, जिन्हें अब घटाकर एक समान (16-16 दिन) कर दिया गया है।
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उत्तर प्रदेश में भी अवकाश सूची जारी
सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने भी साल 2026 के लिए अपनी आधिकारिक अवकाश तालिका स्पष्ट कर दी है। यूपी में रविवार और गर्मियों की छुट्टियों को मिलाकर कुल 112 दिन स्कूल बंद रहेंगे, शीतलहर के प्रकोप को देखते हुए फिलहाल फरवरी माह तक कई जिलों में स्कूलों के समय में बदलाव और अवकाश के निर्देश पहले ही दिए जा चुके हैं।
छात्रों और शिक्षकों पर असर
छुट्टियों में इस कटौती से जहां एक तरफ छात्रों को पढ़ाई के लिए ज्यादा समय मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ शिक्षक संगठनों और अभिभावकों के बीच इस नए कैलेंडर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, कई लोग इसे पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए जरूरी कदम मान रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि इससे बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ सकता है।
















