
सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण और मुआवजे के मामलों में सरकारी सुस्ती और प्रशासनिक लचर रवैये पर कड़ा प्रहार किया है, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि मुआवजे के भुगतान और अदालती अपीलों में होने वाली देरी अब स्वीकार्य नहीं होगी।
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न्याय की राह में ‘देरी’ का बहाना नहीं चलेगा
शीर्ष अदालत ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा कि मुआवजे की अपील दायर करने में होने वाली अत्यधिक देरी अक्सर “प्रशासनिक मिलीभगत” (Official Connivance) का परिणाम होती है, कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि मुआवजे के खिलाफ दायर अपीलों को केवल ‘परिसीमा कानून’ (Limitation Act) की तकनीकी बाधाओं के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
फैसले की 3 बड़ी बातें
- कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे एक प्रभावी निगरानी प्रणाली (Monitoring System) बनाएं, अगर किसी अधिकारी की लापरवाही से मुआवजे में देरी होती है, तो उनकी जवाबदेही तय की जाए।
- कोर्ट ने साफ किया कि जिन मामलों में अधिग्रहण की प्रक्रिया 1894 के पुराने कानून के तहत शुरू हुई थी, लेकिन 1 जनवरी 2014 तक कोई ‘अवार्ड’ (मुआवजा राशि) घोषित नहीं हुआ, वहां किसानों को 2013 के नए कानून के तहत भारी-भरकम मुआवजा दिया जाएगा।
- कोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है, मुआवजे के वितरण में देरी जनता का कानून और न्यायपालिका पर से भरोसा कम करती है।
अधिकारियों को कड़ी चेतावनी
पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारी जानबूझकर अपीलों में देरी करते हैं ताकि कानूनी जटिलताएं पैदा हों, अब अदालतों को निर्देश दिया गया है कि वे समय-सीमा की परवाह किए बिना न्याय के हित में इन याचिकाओं पर सुनवाई करें यह फैसला उन हजारों किसानों और जमीन मालिकों के लिए बड़ी राहत है, जिनकी फाइलें सालों से सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं।
















