
देश की सर्वोच्च अदालत ने संपत्ति उत्तराधिकार के मामले में एक युगान्तरकारी निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि बेटियों का अपने पिता की पैतृक संपत्ति पर जन्मसिद्ध अधिकार है, सुप्रीम कोर्ट ने सालों पुराने पितृसत्तात्मक कानून की व्याख्या को बदलते हुए बेटियों को बेटों के समान ‘सहदायिक’ (Coparcener) का दर्जा दिया है।
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जन्म से मिलेगा अधिकार, पिता का जीवित होना जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट (विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा, 2020) ने अपने फैसले में साफ किया कि बेटी का पैतृक संपत्ति पर अधिकार उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 9 सितंबर 2005 (कानून संशोधन की तिथि) को पिता का जीवित होना अनिवार्य नहीं है。 यदि पिता की मृत्यु 2005 से पहले भी हुई है, तब भी बेटियां कानूनी रूप से संपत्ति में अपना हिस्सा मांग सकती हैं
नए कानून की मुख्य बातें
- शादी के बाद भी अधिकार बरकरार: बेटी की शादी होने से उसके अधिकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वह ताउम्र अपने पिता के परिवार की सदस्य और संपत्ति की हकदार बनी रहती है।
- स्व-अर्जित संपत्ति पर दावा: यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत (Will) किए हो जाती है, तो उनकी खुद की कमाई से बनाई गई संपत्ति (Self-acquired Property) पर भी बेटी का हक बेटे के बराबर ही होगा।
- वसीयत की सीमा: कोई भी पिता अपनी वसीयत के जरिए किसी बेटी को पैतृक संपत्ति के उसके वैध हिस्से से वंचित नहीं कर सकता। पिता केवल अपने हिस्से की संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है।
- पुराने बंटवारे पर रोक: यह नियम उन संपत्तियों पर लागू नहीं होगा जिनका कानूनी बंटवारा (Partition) 20 दिसंबर 2004 से पहले ही पूरी तरह संपन्न हो चुका है।
ऐतिहासिक टिप्पणी
फैसले के दौरान न्यायाधीशों ने एक भावुक लेकिन कानूनी रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणी की “एक बेटा केवल तब तक बेटा है जब तक उसे पत्नी नहीं मिल जाती, लेकिन एक बेटी ताउम्र बेटी ही रहती है” यह कानून भारत में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त और स्वतंत्र बनाता है।
















