लोकसभा में एक नया और चर्चित सुझाव आम आदमी पार्टी के सांसद मालविंदर सिंह कंग ने रखा है. उनका कहना है कि अब शादी से पहले हर दूल्हे का अनिवार्य डोप टेस्ट और मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट लेना चाहिए. यह मांग न सिर्फ कानून की दुनिया में, बल्कि आम जनता के बीच भी बहस छेड़ रही है.

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मांग क्यों उठी?
कंग का कहना है कि देश में तलाक, घरेलू हिंसा और नशे की लत जैसे मामलों में साफ बढ़ोतरी देखी जा रही है. इनमें से कई मामलों में पति की स्वास्थ्य स्थिति या नशे की आदत बाद में सामने आती है, जिससे पत्नी और बच्चों को लंबे समय तक परेशानी झेलनी पड़ती है. उनके तर्क के अनुसार, शादी से पहले लड़की की जाति, शिक्षा, आर्थिक स्थिति और चारित्र की जांच तो व्यवस्थित तरीके से की जाती है, लेकिन लड़के के नशे या गंभीर बीमारियों की जानकारी अक्सर छुपा दी जाती है.
डोप टेस्ट और मेडिकल सर्टिफिकेट क्या है?
डोप टेस्ट आमतौर पर रक्त या मूत्र की जांच से होता है, जिससे यह पता चलता है कि व्यक्ति कोकीन, ओपिएट्स, शराब या अन्य अवैध नशीली दवाओं का उपयोग करता है या नहीं. वहीं मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट में शारीरिक स्वास्थ्य, यौन स्वास्थ्य, एचआईवी, हेपेटाइटिस जैसे संक्रमण और कुछ बड़ी बीमारियों की बेसिक जांच शामिल हो सकती है. कंग का सुझाव है कि विवाह पंजीकरण से पहले दूल्हे को यह सर्टिफिकेट जमा करना अनिवार्य हो, ताकि निकाह निबंधक या मैरिज रजिस्ट्रार शादी को पूरी जानकारी के साथ रजिस्टर कर सकें.
पहले भी उठी थी यह चर्चा
इस तरह की विचार पहले भी कई स्तरों पर आई थी. 2018 में कुछ मामलों में न्यायालय ने नशे से बर्बाद हो चुके परिवारों के हवाले से यह सवाल उठाया था कि क्या शादी से पहले दूल्हे का डोप टेस्ट अनिवार्य होना चाहिए. उस समय सरकारी निकायों की तरफ से इसे अनिवार्य बनाने के लिए सकारात्मक आशय दिखाई नहीं दिया, हालांकि यह सलाह जरूर दी गई थी कि अगर दूल्हा खुद तैयार हो तो टेस्ट करवाने में कोई रोक नहीं होनी चाहिए. इस बार की मांग अलग है, क्योंकि यह सीधे संसद में कानून बनाने के रूप में आई है.
फायदे और आपत्तियां
समर्थकों का कहना है कि ऐसा कानून नशे की लत, छुपी बीमारियों और धोखाधड़ी से बचाव में मदद कर सकता है. शादी से पहले दोनों पक्षों को पूरी जानकारी मिलने के बाद वे जागरूक तरीके से फैसला कर सकेंगे. दूसरी ओर, आलोचक इसे निजता का हनन, लिंग‑भेदभाव और प्रशासनिक ओवरडूटी जैसे खतरों से जोड़ रहे हैं. इसके अलावा प्रशासनिक लागत, ग्रामीण इलाकों में जांच सुविधाओं की कमी और धोखाधड़ी रोकने की चुनौती भी बड़े मुद्दे हैं.
अभी की स्थिति
अभी तक कोई केंद्रीय कानून इस तरह की अनिवार्यता को लागू नहीं कर चुका है. यह सिर्फ एक सांसदी सुझाव है, जिस पर सरकार की औपचारिक प्रतिक्रिया अभी आनी बाकी है. फिर भी यह विचार देशव्यापी चर्चा का विषय बन गया है, जहां शादी की सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन ढूंढने की कोशिश चल रही है.
















