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क्या ईरान युद्ध से थम जाएगी भारत की रफ्तार? LPG और पेट्रोल के ‘स्टॉक’ पर सरकार ने दिया बड़ा बयान; जानें कब तक चलेगा भंडार

ईरान युद्ध के बीच भी भारत ने LPG और पेट्रोल की आपूर्ति सुरक्षित बताई है। सरकार का कहना है कि भंडार कई महीनों तक काफी हैं, लेकिन लोगों से पैनिक बुकिंग से बचने की अपील की जा रही है।

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इंटरनेशनल तनाव बढ़ता है, तो ऊर्जा सुरक्षा पर सवाल भी खड़े होने लगते हैं। ईरान–इजरायल टकराव के बीच भारत के लिए एक बार फिर से LPG और पेट्रोल की आपूर्ति को लेकर चिंता बनी हुई है। खासतौर पर जब देश की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और मोबिलिटी की रफ्तार सीधे तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़ी है।

क्या ईरान युद्ध से थम जाएगी भारत की रफ्तार? LPG और पेट्रोल के 'स्टॉक' पर सरकार ने दिया बड़ा बयान; जानें कब तक चलेगा भंडार

LPG भंडार और घरेलू ज़रूरतों पर नज़र

भारत में लगभग हर तीसरे घर में LPG सिलेंडर चलता है। इसकी कुल खपत का एक अच्छा हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है, जो खाड़ी क्षेत्र और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रता है। यही वह गलियारा है जहां अभी युद्ध के चलते सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स में दिक्कत हो सकती है।

हालांकि, सरकारी तंत्र के अनुसार देश में अभी LPG का करीब 60 दिन का भंडार मौजूद है, जिसे घरेलू उत्पादन, रिफाइनरी आउटपुट और टैंक भंडार के ज़रिए बनाए रखा गया है। घरेलू रिफाइनरी में LPG उत्पादन को बढ़ाते हुए लगभग 50,000 से 55,000 टन प्रतिदिन की क्षमता तक पहुंचा दिया गया है, जबकि कुल दैनिक खपत लगभग 80,000 टन के आसपास मानी जाती है।

इस बीच, घरेलू उपभोक्ता को अन्य उपयोगों के मुकाबले प्राथमिकता दी जा रही है। होटल, रेस्तरां और इंडस्ट्रियल यूज़र्स की LPG आपूर्ति को हल्की कटौती और डिले के साथ चलाया जा रहा है, ताकि आम उपभोक्ता के लिए सिलेंडर की आपूर्ति तुरंत न रुके। कुछ शहरों में डिलीवरी में देरी और लंबी कतारें दिख रही हैं, जिन्हें अधिकतर लॉजिस्टिक देरी और पैनिक बुकिंग का नतीजा माना जा रहा है।

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पेट्रोल और डीजल की स्थिति पर बात

पेट्रोल और डीजल के मामले में भी स्थिति नाज़ुक नहीं, बल्कि संवेदनशील है। कच्चे तेल और तैयार ईंधन दोनों स्तरों पर भंडार काफी हद तक सुरक्षित माने जा रहे हैं। अनुमान के अनुसार देश के पास कच्चे तेल का 25–30 दिन और रिफाइंड फ्यूल का लगभग 25 दिन का भंडार मौजूद है। यह राशि आम हालात में अस्थायी आयात या शिपिंग में दिक्कत आने पर भी कुछ समय तक आपूर्ति को संभालने के लिए काफी है।

रिटेल लेवल पर भी ज़्यादातर जगहों पर पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति सामान्य बनी हुई है। कोई बड़ा रिफ्यूलिंग क्राइसिस अभी नहीं दिख रहा, लेकिन युद्ध की वजह से अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमतें उतार‑चढ़ाव के दौर से गुजर रही हैं। अगर तनाव लंबा खिंचा और तेल की दरें लगातार ऊपर बनी रहीं, तो इसका असर आयात बिल, महंगाई और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट पर पड़ सकता है।

युद्ध के बीच भारत की “रफ्तार” पर क्या असर?

ईरान युद्ध की वजह से शॉर्ट टर्म में भारत की रोज़मर्रा की “रफ्तार” यानी गाड़ी चलाने, ट्रांसपोर्ट चलाने और लॉजिस्टिक नेटवर्क की गतिविधि पर तुरंत उल्टा असर दिखने की संभावना कम है। भंडार और लॉजिस्टिक ढांचा अभी इस दबाव को संभाल रहा है। लेकिन लंबे समय में अगर तेल कीमतें ऊपर बनी रहीं, तो फ्यूल बिल बढ़ने से महंगाई, ट्रांसपोर्ट कॉस्ट और टैक्स रिव्यू पर दबाव बढ़ सकता है।

सरकार की मुख्य कोशिश यह है कि उपभोक्ताओं में अफवाह, पैनिक बुकिंग और ज़्यादा से ज़्यादा LPG सिलेंडर बुक करने की लाइन न बने। इस दौर में यह ज़रूरी है कि लोग तथ्य‑आधारित जानकारी पर भरोसा करें, न कि सोशल मीडिया और अफवाहों पर। ऊर्जा भंडार और वैकल्पिक रूट तैयार करने की हेलीकॉप्टर व्यू के साथ ही जनता का व्यवहार भी तय करेगा कि क्या युद्ध के बीच भारत की रफ्तार धीमी होगी या संतुलित बनी रहेगी।

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info@ortpsa.in

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