
दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच परमाणु युद्ध की आहट ने मानवता को डरा दिया है, परमाणु हमले का नाम सुनते ही आंखों के सामने तबाही और रेडिएशन (विकिरण) का खौफनाक मंजर आ जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसी दवा है जो शरीर के भीतर घुस चुके घातक रेडिएशन के असर को खत्म कर सकती है? इस चमत्कारिक दवा का नाम है ‘पर्शियन ब्लू’ (Prussian Blue) ।
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क्या है पर्शियन ब्लू दवा?
पर्शियन ब्लू (वैज्ञानिक नाम: इनसोल्बुल प्रशियन ब्लू) असल में एक गहरे नीले रंग का रासायनिक यौगिक है, दशकों तक इसका इस्तेमाल पेंट, स्याही और कपड़ों की रंगाई में एक ‘डाई’ के रूप में होता था, लेकिन चिकित्सा विज्ञान ने खोजा कि इसमें रेडियोधर्मी तत्वों को सोखने की अद्भुत क्षमता है, साल 2003 में इसे परमाणु आपातकाल के दौरान इलाज के लिए आधिकारिक मंजूरी मिली।
रेडिएशन के ‘जहर’ को कैसे काटती है यह दवा?
परमाणु विस्फोट के बाद हवा और पानी में सीजियम-137 और थैलियम जैसे बेहद खतरनाक रेडियोधर्मी तत्व घुल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति सांस या भोजन के जरिए इन्हें शरीर के अंदर ले लेता है, तो यह दवा ‘सुरक्षा कवच’ का काम करती है:
- मैग्नेट की तरह काम: यह कैप्सूल आंतों में जाकर रेडियोधर्मी तत्वों को अपनी ओर खींच लेता है और उन्हें जकड़ लेता है।
- रक्त में घुलने से रोकना: यह जहर को खून में मिलने से रोकती है, जिससे शरीर के अंगों (जैसे किडनी और लीवर) को होने वाला नुकसान कम हो जाता है।
- प्राकृतिक निकासी: यह दवा रेडिएशन को सोखकर उसे मल के रास्ते शरीर से बाहर निकाल देती है। जो रेडियोधर्मी तत्व शरीर में 110 दिनों तक रहकर कैंसर पैदा कर सकते थे, वे इस दवा की मदद से मात्र 30 दिनों में बाहर निकल जाते हैं।
भारत बना ‘ग्लोबल हब’: कहाँ हो रहा है निर्माण?
राहत की बात यह है कि भारत इस जीवनरक्षक दवा के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर है इसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) की दिल्ली स्थित प्रयोगशाला ‘इनमास’ (INMAS) ने स्वदेशी तकनीक से विकसित किया है।
- उत्पादन केंद्र: भारत सरकार ने इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए निजी कंपनियों को लाइसेंस दिया है वर्तमान में यह दवा हिमाचल प्रदेश (बद्दी) और गुजरात (अहमदाबाद) की फार्मा इकाइयों में बनाई जा रही है।
- ग्लोबल डिमांड: परमाणु खतरों को देखते हुए खाड़ी देशों (कुवैत, कतर, बहरीन) ने भारत से इस दवा की मांग की है, जो भारत की बढ़ती औषधीय शक्ति का प्रमाण है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह दवा केवल डॉक्टर की सलाह पर और परमाणु आपातकाल की स्थिति में ही ली जानी चाहिए यह बाहरी रेडिएशन (त्वचा का जलना) पर काम नहीं करती, बल्कि शरीर के अंदरूनी अंगों को बचाती है।
















