भारत और ईरान के बीच आर्थिक रिश्ते रणनीतिक और व्यापारिक महत्व के रहे हैं। सोशल मीडिया पर आजकल सवाल उठ रहा है कि ईरान भारत का कितना कर्ज चुकाने को बाकी रखे हुए है। गहन विश्लेषण से पता चलता है कि सरकारी स्तर पर कोई बड़ा बकाया नहीं है। बल्कि निजी व्यापारिक लेन-देन और ऊर्जा व्यापार में कुछ चुनौतियां नजर आती हैं। कुछ साल पहले भारतीय चावल निर्यातकों के पास ईरान से करीब 700 करोड़ रुपये बाकी थे। ईरान की मुद्रा रियाल की कमजोरी और भुगतान में देरी के चलते निर्यात संघ ने नई बिक्री पर रोक लगा दी थी। यह निजी क्षेत्र का मामला था, सरकार का सीधा ऋण नहीं।

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तेल व्यापार की चुनौतियाँ
दोनों देशों के बीच कच्चे तेल का कारोबार मुख्य आधार रहा। वैश्विक प्रतिबंधों के दौर में भारत ने तेल खरीद का भुगतान रुपये में विशेष बैंक खातों में जमा किया। इसमें भारत ही ईरान के प्रति कुछ बकाया रखता था, न कि उलटा। ईरान ने इन रुपये का उपयोग भारत से चावल, दवाइयां और अन्य सामान खरीदने में किया। आज भी यह व्यवस्था वैकल्पिक तरीकों से चल रही है। ऊर्जा आयात पर निर्भरता के कारण दोनों देश सावधानी से लेन-देन संभालते हैं।
चाबहार बंदरगाह का रणनीतिक निवेश
चाबहार बंदरगाह विकास एक महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत ने निर्यात-आयात बैंक के माध्यम से करीब 150 मिलियन डॉलर की ऋण सुविधा उपलब्ध कराई। यह मध्य एशिया और अफगानिस्तान से जुड़ाव के लिए जरूरी कदम था। निवेश परियोजना से ही वापस होगा, इसे सामान्य कर्ज की तरह नहीं देखा जाता। अभी तक कोई चूक की खबर नहीं है। विशेषज्ञ इसे भू-राजनीतिक साझेदारी का हिस्सा मानते हैं।
वर्तमान आर्थिक संबंध
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत ने ईरान को कोई बड़ा प्रत्यक्ष ऋण नहीं दिया। संबंध ऊर्जा सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर केंद्रित हैं। ईरान ने हाल ही में भारत को समुद्री संकट में मदद के लिए धन्यवाद दिया। राष्ट्रीय कर्ज की चर्चाओं में ईरान का नाम कम ही आता है। चावल बकाया पुराना मामला प्रतीत होता है, जिसका नया विवरण उपलब्ध नहीं। कुल मिलाकर दोनों देश मजबूत सहयोग जारी रखे हुए हैं। भविष्य में तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता पर फोकस बढ़ेगा। व्यापारिक उलझनों के बावजूद रिश्ते मजबूत बने रहेंगे।
















