भारत के ज्यादातर शहरों में पुलिसकर्मी खाकी वर्दी में नजर आते हैं, लेकिन कोलकाता इसका अपवाद है। यहां की पुलिस सफेद वर्दी पहनती है, जो शहर की सड़कों पर एक अलग चमक बिखेरती है। यह महज फैशन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक कारणों से बनी परंपरा है। गर्मी से राहत और अलग पहचान के लिए चुनी गई यह वर्दी आज भी जारी है।

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ब्रिटिश काल की शुरुआत
19वीं सदी के मध्य में जब ब्रिटिश शासन ने कोलकाता में आधुनिक पुलिस व्यवस्था शुरू की, तो सफेद वर्दी का चयन किया गया। 1840 के दशक में स्थापित यह फोर्स देश की सबसे पुरानी संगठित पुलिस इकाई बनी। उस समय सफेद रंग को साफ-सुथरा और आरामदायक समझा जाता था। बंगाल की आर्द्र जलवायु में यह हल्का कपड़ा गर्मी से बचाव करता था। सफेद रंग सूरज की किरणों को परावर्तित कर ठंडक का अहसास देता था।
खाकी का आगमन और इनकार
बाद में ब्रिटिशों ने सफेद वर्दी की समस्या देखी। धूल भरी सड़कों पर यह जल्दी गंदी हो जाती थी। इसलिए उन्होंने प्राकृतिक रंगों से खाकी तैयार किया, जो धूल छुपाता था और सैन्य जरूरतों के अनुकूल था। पूरे देश में यह मानक बन गया। लेकिन कोलकाता पुलिस ने अपनी सफेद वर्दी को नहीं छोड़ा। शहर की खास व्यवस्था ने इसे बरकरार रखा। यह निर्णय प्रशासनिक और जलवायु संबंधी वजहों से लिया गया।
आज की वर्दी का स्वरूप
वर्तमान में कोलकाता पुलिस सफेद शर्ट और पैंट पहनती है, जिसमें नीले एपलेट्स और बेल्ट होती हैं। अधिकारी थोड़े खाकी शेड वाली सफेद वर्दी में दिखते हैं। यह डिजाइन शहर पुलिस को राज्य पुलिस से अलग करती है। राज्य स्तर पर खाकी वर्दी चलती है, जबकि महानगर पुलिस सफेद। इससे जनता को तुरंत पहचान हो जाती है। सफेद वर्दी अनुशासन और शांति की छवि बनाती है।
रखरखाव की चुनौती
सफेद वर्दी को हमेशा साफ रखना मुश्किल होता है। रोजाना धुलाई और प्रेसिंग जरूरी है। फिर भी पुलिसकर्मी इसे गर्व से पहनते हैं। शहरवासी इसे अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं। सोशल मीडिया पर युवा इसे आधुनिक और आकर्षक बताते हैं। कुछ लोग बदलाव की बात करते हैं, लेकिन परंपरा मजबूत है।
















