सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही खबरें दावा कर रही हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों के पैतृक संपत्ति के अधिकारों को समाप्त कर दिया है। ये दावे भ्रमपूर्ण हैं और ज्यादातर पुराने फैसलों की गलत व्याख्या पर आधारित हैं। वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार दिए हैं, जो जन्म से ही लागू होते हैं। यह फैसला लैंगिक समानता को मजबूत करता है, न कि कमजोर। आइए समझते हैं पूरी सच्चाई।

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फैसले का पूरा सच
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 के संशोधन ने बेटियों को हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की पैतृक संपत्ति में जन्म से ही सहदायिक का दर्जा दिया। इसका मतलब है कि बेटी बेटे की तरह ही संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार होती है, चाहे वह शादीशुदा हो या अविवाहित। यह अधिकार 9 सितंबर 2005 से प्रभावी है और पिता के जीवित या मृत होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
2020 के विनीता शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्पष्ट रूप से स्थापित किया, जिसमें कहा गया कि बेटियों का अधिकार जन्मजात है। हाल के वर्षों में भी कई फैसलों ने इसकी पुष्टि की है, जैसे कि 2025 के मल्लेश्वरी बनाम के. सुगुणा मामले में, जहां बेटी को एक-तिहाई हिस्सा सुनिश्चित किया गया। कोर्ट ने कभी भी बेटियों के अधिकारों को रद्द नहीं किया, बल्कि अपवादों को सीमित किया।
सोशल मीडिया पर भ्रम क्यों?
वायरल पोस्ट्स और यूट्यूब वीडियो अक्सर चीख-पुकार भरे शीर्षकों के साथ आते हैं, जैसे “बेटियों का हक खत्म” या “2025 का नया नियम”। ये दावे विशेष परिस्थितियों को सामान्य करके फैलाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई बेटी ने पिता से कानूनी रूप से संबंध तोड़ लिया हो या पुराने विभाजन (20 दिसंबर 2004 से पहले) वाले मामले हों, तो दावा सीमित हो सकता है। लेकिन ये अपवाद हैं, नियम नहीं। स्व-अर्जित संपत्ति पर वसीयत का प्राथमिकता भी सामान्य बात है, जो बेटों पर भी लागू होती है। ऐसे भ्रम से लाखों महिलाएं प्रभावित हो रही हैं, जबकि कानून उनके पक्ष में मजबूत खड़ा है।
बेटियों के क्या हैं अधिकार?
पैतृक संपत्ति में बेटी को बेटे के बराबर हिस्सा मिलता है, क्योंकि वह HUF की जन्मजात सदस्य होती है। शादी का कोई असर नहीं पड़ता शादीशुदा बेटी भी पूर्ण हकदार है। स्व-अर्जित संपत्ति के मामले में, अगर पिता ने वसीयत लिखी है, तो उसी के अनुसार बंटवारा होता है; बिना वसीयत के सभी संतानों को बराबर हिस्सा। माता की संपत्ति में भी बेटियां प्रमुख उत्तराधिकारी हैं। अपवाद सिर्फ तभी लागू होते हैं जब बेटी ने पिता के पालन-पोषण से इनकार किया हो या परिवार से पूरी तरह अलग हो गई हो। इन नियमों को समझने से संपत्ति विवाद कम हो सकते हैं।
सामाजिक और कानूनी प्रभाव
यह फैसला न केवल कानूनी है, बल्कि सामाजिक क्रांति भी। इससे बेटियों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने का अवसर मिला है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बेटियों को संपत्ति से वंचित रखा जाता था, वहां अब जागरूकता फैल रही है। हालांकि, कई परिवार अभी भी पुरानी मान्यताओं से चिपके हैं, जिससे अदालतों में मामले बढ़ रहे हैं। सरकार और एनजीओ को जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, ताकि हर बेटी अपने हक के प्रति सशक्त हो।
क्या करें बेटियां?
अपने दस्तावेज जैसे जन्म प्रमाण पत्र, परिवार के रिकॉर्ड और संपत्ति विवरण की जांच करें। अगर विवाद हो, तो स्थानीय वकील या तहसील से संपर्क करें। ऑनलाइन पोर्टल जैसे भूलेख या कोर्ट वेबसाइट से जानकारी लें। अफवाहों पर भरोसा न करें कानून स्पष्ट है। सुप्रीम कोर्ट बार-बार बता चुका है कि बेटियां अब संपत्ति की मालिक हैं, न कि भिखारी।
यह ऐतिहासिक फैसला हर बेटी के लिए मील का पत्थर है। समय आ गया है कि समाज इसे स्वीकार करे और बेटियों को उनका पूर्ण हक दे। कानून बेटियों के साथ है, अब परिवार भी साथ दें।
















