कैलेंडर पलटते ही फरवरी का नाम आते ही एक सवाल कौंध उठता है। बाकी महीने 30 या 31 दिनों तक फैले रहते हैं, लेकिन फरवरी महज 28 दिनों में सिमट जाती है। लीप वर्ष में एक अतिरिक्त दिन तो मिल जाता है, पर सामान्य सालों में यह हमेशा सबसे छोटा बना रहता है। यह महज संयोग नहीं, बल्कि प्राचीन रोमन सभ्यता के एक अनोखे फैसले का परिणाम है, जो हजारों सालों से चला आ रहा है। आइए इसकी जड़ों को खंगालें।

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प्राचीन रोम का 10 महीनों वाला कैलेंडर
सबसे पहले बात रोम के शुरुआती दिनों की। रोम के संस्थापक राजा रोमुलस ने एक साधारण कैलेंडर बनाया था, जिसमें सिर्फ दस महीने थे। मार्च से दिसंबर तक फैले ये महीने कुल मिलाकर 304 दिनों के थे। सर्दियों के ठंडे दिन गिनती से बाहर रहते थे। उस दौर में किसान खेतों से दूर रहते, योद्धा जंग के मैदान में व्यस्त हो जाते। समय बीता तो रोमन समाज ने महसूस किया कि यह व्यवस्था अपूर्ण है। दूसरे राजा नुमा पोम्पिलियस ने बड़ा बदलाव लाया। उन्होंने साल के शुरू में जनवरी और फरवरी जोड़ दिए। अब कैलेंडर 12 महीनों का हो गया, कुल 355 दिनों के साथ। यह चंद्र चक्र पर आधारित था, लेकिन सूर्य की परिक्रमा 365 दिनों की होती है। फर्क मिटाने के लिए हर दो तीन साल में एक अतिरिक्त महीना डाल दिया जाता। फिर भी असंतुलन बना रहा।
सम अंकों का अंधविश्वास और फरवरी का छोटा कद
यहां आता है फरवरी का मुख्य रहस्य। रोमन संस्कृति में सम संख्याओं को अशुभ माना जाता था। हर महीने को विषम दिनों से भरने की कोशिश हुई, जैसे 29 या 31। लेकिन कुल दिनों को ठीक फिट करने के चक्कर में फरवरी को 28 दिन दे दिया गया। यह एकमात्र जगह बची जहां सम संख्या ठहर गई। फरवरी का नाम लैटिन शब्द से पड़ा, जो शुद्धिकरण और पापों से मुक्ति दर्शाता है। रोमन इसे मृतकों की स्मृति और बुरी शक्तियों का महीना मानते थे। छोटा रखने से यह जल्दी खत्म हो जाता, सोचा गया। इस तरह परंपरा और विश्वास ने दिनों की गिनती तय कर दी।
जूलियन से ग्रेगोरियन तक का सफर
कई शताब्दियां बाद जूलियस सीजर ने सुधार किया। उन्होंने फरवरी को 29 दिन का करार दिया और हर चौथे साल लीप दिवस जोड़ा। इसका कारण पृथ्वी का सूर्य भ्रमण, जो 365 दिनों से थोड़ा ज्यादा लेता है। बाद में पोप ग्रेगरी ने और बारीकियां जोड़ीं। कुछ सदी वाले साल लीप नहीं होते, जब तक वे खास नियमों से न गुजरें। आज का ग्रेगोरियन कैलेंडर यही है, जो भारत समेत पूरी दुनिया में प्रचलित है। वैज्ञानिकों ने कई बार समान दिनों वाले कैलेंडर का प्रस्ताव दिया, लेकिन पुरानी जड़ें इतनी मजबूत हैं कि कोई बदलाव नहीं हुआ।
आज के दौर में फरवरी की प्रासंगिकता
फरवरी 2026 में हम इसी व्यवस्था से चल रहे हैं। यह महीना छोटा होने के बावजूद खास है। जन्मदिन, त्योहार और ऐतिहासिक घटनाएं इसमें सिमट आती हैं। वैलेंटाइन्स डे से लेकर लीप वर्ष की दुर्लभता तक, यह उत्साह भर देता है। लेकिन मूल सवाल वही है, क्यों नहीं बदला गया। जवाब छिपा है मानव इतिहास की गहराई में। रोमन राजा का वह फैसला आज भी हमें याद दिलाता है कि परंपराएं कितनी स्थायी होती हैं। क्या भविष्य में कोई नया कैलेंडर आएगा। शायद, लेकिन फिलहाल फरवरी अपना छोटापन गर्व से निभा रही है।
















