
मध्य पूर्व (Middle East) के इतिहास में एक ऐसा पन्ना है जिसने न केवल एक नए देश को जन्म दिया, बल्कि एक अंतहीन संघर्ष की नींव भी रख दी आज जिस इजरायल को हम एक आधुनिक सैन्य शक्ति के रूप में देखते हैं, उसके बनने की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, यह कहानी शुरू होती है एक ब्रिटिश ‘ऐलान’ से, जिसने फिलिस्तीन की तकदीर को हमेशा के लिए मोड़ दिया।
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वो एक चिट्ठी जिसने मचाया कोहराम: बाल्फोर घोषणा
साल 1917, प्रथम विश्व युद्ध के बीच ब्रिटेन के तत्कालीन विदेश सचिव आर्थर बाल्फोर ने एक ऐसा पत्र लिखा जो इतिहास में ‘बाल्फोर घोषणा’ के नाम से दर्ज हुआ। इस पत्र में ब्रिटेन ने फिलिस्तीन की धरती पर यहूदियों के लिए एक ‘नेशनल होम’ बनाने का वादा किया हैरान करने वाली बात यह थी कि उस समय फिलिस्तीन ब्रिटेन का हिस्सा भी नहीं था, वह ओटोमन साम्राज्य के अधीन था। इस एक वादे ने दुनिया भर के यहूदियों के लिए उम्मीद जगा दी, तो वहीं वहां रह रहे अरबों के लिए खतरे की घंटी बजा दी।
जायोनी आंदोलन और ‘वापसी’ का सपना
19वीं सदी के अंत में यूरोप में यहूदियों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव ने ‘जायोनी आंदोलन’ (Zionism) को जन्म दिया। थियोडोर हर्जल के नेतृत्व में यहूदियों ने अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान किया। शुरुआती दौर में, यहूदियों ने फिलिस्तीन में धीरे-धीरे जमीनें खरीदना शुरू किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जर्मनी में एडोल्फ हिटलर ने ‘होलोकॉस्ट’ (यहूदियों का नरसंहार) किया, तो जान बचाकर भाग रहे लाखों यहूदियों के लिए फिलिस्तीन ही एकमात्र ठिकाना बचा। ब्रिटिश शासन (British Mandate) के दौरान यहूदियों की आबादी वहां तेजी से बढ़ने लगी, जिससे अरबों और यहूदियों के बीच हिंसक टकराव शुरू हो गए।
1948: आधी रात को हुआ देश का उदय
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने थककर यह मुद्दा नवगठित संयुक्त राष्ट्र (UN) को सौंप दिया। UN ने 1947 में फिलिस्तीन के बंटवारे का प्रस्ताव (Resolution 181) रखा।
- प्रस्ताव: एक हिस्सा यहूदियों के लिए और दूसरा अरबों के लिए।
- नतीजा: यहूदियों ने इसे स्वीकार किया, लेकिन अरब देशों ने अपनी जमीन बांटने से इनकार कर दिया।
अंततः, 14 मई 1948 को ब्रिटिश शासन खत्म होते ही डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल की आजादी का ऐलान कर दिया। लेकिन यह आजादी शांति लेकर नहीं आई।
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जंग और ‘नकबा’ का दर्द
इजरायल के जन्म के 24 घंटे के भीतर ही 5 पड़ोसी अरब देशों (मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक और लेबनान) ने हमला कर दिया इजरायल ने न सिर्फ खुद को बचाया, बल्कि UN द्वारा दी गई जमीन से कहीं ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर लिया इस युद्ध ने एक मानवीय त्रासदी को जन्म दिया जिसे फिलिस्तीनी इतिहास में ‘नकबा’ (बड़ी तबाही) कहा जाता है करीब 7 लाख से ज्यादा फिलिस्तीनी बेघर हो गए और शरणार्थी बन गए।
इजरायल का जन्म एक तरफ यहूदियों के लिए सदियों पुराने संघर्ष का अंत था, तो दूसरी तरफ फिलिस्तीनियों के लिए एक नए संघर्ष की शुरुआत आज सात दशक बाद भी, एक ‘ऐलान’ से शुरू हुई यह कहानी युद्ध और शांति के बीच झूल रही है।
















