भारत का हरा भरा दक्षिणी राज्य केरल जल्द ही नक्शे पर नए नाम से नजर आएगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य का नाम केरलम करने के प्रस्ताव पर हरी झंडी दे दी है। यह कदम मलयालम भाषा की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया है। मई 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले यह फैसला राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। राज्य सरकार इसे सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बता रही है, जबकि संसद की मंजूरी अब अंतिम बाधा बनी हुई है।

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मूल नाम की बहाली क्यों जरूरी
केरलम शब्द मलयालम में नारियल की भूमि का बोध कराता है। ब्रिटिश काल में इसका उच्चारण बदलकर केरल कर दिया गया था। अब राज्य अपनी प्राचीन पहचान लौटाने की कोशिश में जुटा है। वाम मोर्चा सरकार ने पिछले दो सालों में विधानसभा से इस बदलाव के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराए। मुख्यमंत्री ने इसे मलयाली अस्मिता से जोड़ा। यह बदलाव भाषाई शुद्धता का उदाहरण है, जो अन्य राज्यों को भी प्रेरित कर सकता है।
संविधान के रास्ते पर चलते फैसले
राज्य का नाम बदलना आसान नहीं। संविधान राज्य विधानसभा को प्रस्ताव पास करने का अधिकार देता है, लेकिन अंतिम मुहर केंद्र की होती है। कैबिनेट की सहमति के बाद संसद में विधेयक पेश होगा। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बहुमत से पास होने पर राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलेगी। पहले भी ओरिस्सा से ओडिशा और कोलकाता जैसे बदलाव इसी प्रक्रिया से हुए। बजट सत्र में बिल आ सकता है, लेकिन विपक्ष की चालाकी से इसमें देरी हो सकती है।
प्रशासनिक चुनौतियां और खर्च
नया नाम अपनाने से सरकारी तंत्र में व्यापक बदलाव जरूरी होंगे। नक्शे, दस्तावेज, पासपोर्ट, स्कूल किताबें और वेबसाइटें सब नये सिरे से बनानी पड़ेंगी। अनुमान है कि इस पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होंगे। पर्यटन उद्योग पर भी असर पड़ेगा। गॉड्स ओन कंट्री अब केरलम से जाना जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्चारण की समस्या हो सकती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर गर्व बढ़ेगा।
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राजनीतिक मायने और जनभावना
विपक्षी नेता इसे चुनावी हथकंडा बता रहे हैं। कुछ का मानना है कि विकास के सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश है। फिर भी मलयालम भाषी लोगों में उत्साह है। पड़ोसी राज्यों में भी भाषाई आंदोलन तेज हो सकते हैं। सरकार का दावा है कि यह कदम क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करेगा। चुनावी माहौल में यह मुद्दा गरमाता चला जाएगा।
आगे की राह क्या?
संसद में बहस के बाद ही साफ होगा कि केरलम नाम हकीकत बनेगा या नहीं। अगर मंजूर हुआ तो यह संघीय भारत में राज्यों की महत्वाकांक्षाओं का नया उदाहरण बनेगा। फिलहाल राज्य में खुशी का माहौल है। आने वाले दिनों में यह बदलाव देशव्यापी चर्चा का विषय बनेगा। भाषा और संस्कृति के नाम पर उठा यह कदम इतिहास रचने को तैयार है।
















