सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के पुराने भूमि अधिग्रहण विवादों पर अहम टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने हालिया सुनवाई में स्पष्ट किया कि 2018 से पहले निपट चुके मामले दोबारा नहीं खोले जाएंगे। यह बयान NHAI की ओर से दायर समीक्षा याचिका पर आया, जिसका असर लाखों प्रभावित किसानों और भूस्वामियों पर सीधा पड़ेगा।

Table of Contents
पुराने फैसले की पृष्ठभूमि
कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने NHAI अधिनियम की एक धारा को असंवैधानिक करार दिया था। उस धारा के तहत राजमार्ग परियोजनाओं के लिए ली गई जमीन पर सामान्य भूमि अधिग्रहण कानून के लाभ जैसे अतिरिक्त मुआवजा और ब्याज नहीं दिया जाता था। कोर्ट ने इसे समानता के अधिकार के खिलाफ माना और पुराने मामलों में भी इन लाभों को लागू करने का निर्देश दिया। नतीजा यह हुआ कि 1997 से 2015 के बीच अधिग्रहीत हजारों हेक्टेयर जमीन के मालिकों ने रेट्रोस्पेक्टिव मुआवजे का दावा ठोंका। इससे NHAI पर करीब 32,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ने की आशंका पैदा हो गई।
कोर्ट का ताजा रुख
अब कोर्ट ने कहा है कि पहले ही बंद हो चुके 2018 पूर्व के केसों को पुनः खोलना उचित नहीं होगा। बेंच का मत है कि इससे न्यायिक प्रक्रिया जटिल हो जाएगी। हालांकि, 2008 के आसपास अभी लंबित विवादों को आगे बढ़ने दिया जाएगा। इनमें भूस्वामियों को पूरा मुआवजा और ब्याज मिलने की संभावना बनी हुई है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को दो सप्ताह में लिखित तर्क पेश करने को कहा है और मामला फिर से सूचीबद्ध करने का आदेश दिया। अंतिम लिखित फैसला आने तक स्थिति अस्पष्ट रहेगी, लेकिन मौखिक टिप्पणियां पुराने निपटारों को अंतिम मानने की ओर इशारा करती हैं।
भूस्वामियों पर प्रभाव
इस बदलाव से सबसे ज्यादा प्रभावित पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के वे किसान होंगे, जिनकी जमीन प्रमुख राजमार्ग परियोजनाओं जैसे लुधियाना-चंडीगढ़ हाईवे या यमुना एक्सप्रेसवे के लिए ली गई। इन परिवारों को अब मूल मुआवजे तक सीमित रहना पड़ेगा, जबकि ब्याज और अतिरिक्त राशि का सपना टूट जाएगा। महंगाई के दौर में यह रकम उनके लिए महत्वपूर्ण होती, जो कई बार मूल मूल्य से कई गुना अधिक होती। किसान संगठनों में नाराजगी है और वे इसे विकास के नाम पर भूस्वामियों के हितों की अनदेखी बता रहे हैं। एक प्रभावित ने कहा, हमने जमीन दी, लेकिन न्याय का इंतजार अधूरा रह गया।
NHAI को मिली राहत
दूसरी ओर, NHAI के लिए यह फैसला वरदान साबित हो सकता है। प्राधिकरण ने लंबे समय से तर्क दिया था कि पुराने मामलों में बढ़ा मुआवजा देना बजट को चूस लेगा और राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क का विस्तार रुक जाएगा। देश में 1.4 लाख किलोमीटर से ज्यादा हाईवे पर काम चल रहा है, ऐसे में वित्तीय स्थिरता जरूरी है। इस फैसले से रुकी परियोजनाएं पटरी पर लौट सकती हैं।
आगे की राह
भूमि अधिग्रहण कानूनों में संतुलन बनाना अब सरकार के लिए चुनौती है। 2013 के अधिनियम के बावजूद पुरानी जटिलताएं बनी हुई हैं। प्रभावित पक्षों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय उच्च न्यायालय या NHAI कार्यालय से अपने मामले का स्टेटस जांचें। जैसे ही कोर्ट का लिखित आदेश जारी होगा, नई स्पष्टता मिलेगी। कुल मिलाकर, यह निर्णय विकास और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन की याद दिलाता है। क्या सरकार अब पुनर्वास या वैकल्पिक सहायता पैकेज लाएगी, यह देखना बाकी है।
















