कोविड-19 वैक्सीन के गंभीर दुष्प्रभावों से जूझ रहे लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह वैक्सीनेशन के बाद होने वाले साइड इफेक्ट्स पर तुरंत मुआवजा देने वाली नई नीति बना ले। यह नो-फॉल्ट सिस्टम होगा, यानी किसी की गलती साबित किए बिना पीड़ितों को सहायता मिलेगी। इस फैसले से लाखों परिवारों को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है, जो महामारी के दौरान वैक्सीन के जोखिमों का शिकार बने।

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फैसले की पृष्ठभूमि और महत्व
यह मामला साल 2021 से चल रहा था, जब कोविशील्ड जैसी वैक्सीन लेने के बाद कुछ लोगों को जानलेवा दुष्प्रभाव झेलने पड़े। दो महिलाओं की मौत ने शुरुआती याचिकाओं को जन्म दिया, जिसमें मुआवजे की मांग की गई। सरकार ने पहले कहा था कि आपदा के समय कोई अलग से मुआवजा योजना नहीं चलाई गई। लेकिन फरवरी 2025 में कोर्ट ने नीति बनाने पर सवाल उठाए। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने 9 मार्च को अंतिम आदेश जारी करते हुए मौजूदा निगरानी तंत्र को बनाए रखने को कहा, लेकिन नया कोई पैनल गठित न करने पर जोर दिया।
यह कदम इसलिए बड़ा है क्योंकि भारत में 200 करोड़ से अधिक डोज लगीं। ज्यादातर लोगों को फायदा हुआ, लेकिन दुर्लभ मामलों में हृदय संबंधी परेशानियां, थक्के या न्यूरोलॉजिकल नुकसान सामने आए। कोर्ट का मानना है कि वैक्सीनेशन अभियान की सफलता पर यह सवाल नहीं उठाता, बल्कि असाधारण स्थितियों में सुरक्षा जाल बिछाता है।
नई नीति में क्या होगा शामिल
नो-फॉल्ट पॉलिसी का मतलब साफ है। वैक्सीन निर्माता या प्रशासन की कोई भूल मानने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गंभीर मामलों जैसे स्थायी विकलांगता या मौत पर परिवार सीधे दावा कर सकेंगे। सरकार को अब मुआवजा राशि, दावा प्रक्रिया और समयसीमा तय करनी होगी। डेटा को सार्वजनिक करने पर भी बल दिया गया है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इससे भविष्य के स्वास्थ्य अभियानों में जनता का भरोसा और मजबूत होगा।
पीड़ितों की प्रतिक्रिया और आगे की राह
जितने भी पीड़ित परिवार हैं उनके लिए एक बड़ी खुशखबरी है। एक प्रभावित ने कहा, हमारा लंबा संघर्ष सफल हुआ। अब ऐसे हादसों में कोई लाचार न रहे। हालांकि सरकार की ओर से अभी औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। चुनौती यह होगी कि लाखों संभावित दावों को कैसे संभाला जाए। समय पर नीति लागू न होने पर नई याचिकाएं आ सकती हैं।
यह फैसला सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के लिए मील का पत्थर साबित होगा। वैश्विक स्तर पर भी अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जो भारत के इस कदम को मजबूत आधार देंगी। कुल मिलाकर, कोर्ट ने न केवल अतीत के घावों को मरहम लगाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण रखा।
















