
राजस्थान में विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू (डीएनटी) आदिम समुदाय ने अपने बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों के लिए आक्रामक मोर्चा खोल दिया है। लोक सुराज संगठन के बैनर तले बुधवार को विधानसभा का घेराव करते हुए हजारों कार्यकर्ताओं ने 10 फीसदी अलग आरक्षण, हर परिवार को कृषि भूमि आवंटन, आर्थिक सशक्तीकरण और नागरिक आय अधिकार जैसी 21 सूत्रीय मांगें सरकार के सामने रख दीं। यह आंदोलन न केवल पिछड़े वर्गों की लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा को उजागर करता है, बल्कि राज्य सरकार के लिए नई राजनीतिक चुनौती पैदा कर रहा है, खासकर पंचायत चुनावों के मद्देनजर।
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गोपाल केसावत का अल्टीमेटम
लोक सुराज के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल केसावत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “डीएनटी समाज दशकों से सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण का शिकार रहा है। केंद्र व राज्य सरकारें इन मांगों पर खानापूर्ति करती रहीं, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया।” उन्होंने 26 जून तक का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी कि मांगें पूरी न होने पर जयपुर में महापड़ाव और पूरे प्रदेश में आंदोलन छेड़ा जाएगा। केसावत का यह बयान राज्य की भजनलाल-गहलोत सरकार के लिए घंटी बजा रहा है, जो पहले ही मराठा, जाट और ओबीसी आरक्षण विवादों में उलझ चुकी है।
शहीद स्मारक से जुलूस
प्रदर्शन की शुरुआत शहीद स्मारक से भव्य जुलूस के साथ हुई। बड़ी संख्या में समुदाय के लोग, महिलाएं, युवा और बच्चे सड़कों पर उतर आए। नारे लगाते हुए वे विधानसभा पहुंचे, जहां जोरदार धरना दिया गया। प्रतिनिधिमंडल ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ओटाराम देवासी को ज्ञापन सौंपा, जिसमें मांगों पर तत्काल कार्रवाई की अपील की गई। कार्यक्रम में अंबेडकराईट पार्टी ऑफ इंडिया, आदिवासी विकास परिषद, सर्व पिछड़ा वर्ग समाज और अन्य संगठनों के पदाधिकारी व जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए, जिससे आंदोलन को व्यापक एकजुटता मिली।
राजस्थान के व्यापक आरक्षण आंदोलनों का हिस्सा
यह आंदोलन राजस्थान के पिछड़े वर्ग आंदोलनों की कड़ी का हिस्सा है। हाल ही में कोंडागांव में सर्व पिछड़ा वर्ग समाज ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण की बहाली के लिए आरक्षण रोस्टर जलाकर विरोध जताया था। वहां प्रदर्शनकारियों ने 17 जनवरी को बीजेपी नेताओं के निवास घेराव की धमकी दी थी, जो निकाय व पंचायत चुनावों में ओबीसी कोटे की कटौती के खिलाफ था।
इसी तरह, मराठा आरक्षण आंदोलनकारियों ने महाराष्ट्र में 10 फीसदी ओबीसी कोटा की मांग की है। इन घटनाओं से साफ है कि आरक्षण का मुद्दा अब जातिगत समीकरणों को पार कर आर्थिक व भूमि अधिकारों से जुड़ गया है। विमुक्त-घुमंतू समाज, जो परंपरागत रूप से घुमंतू जीवनशैली अपनाता रहा है, को संविधान में अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बावजूद जमीन के हक से वंचित रखा गया है। संगठन का कहना है कि हर परिवार को कम से कम 5 एकड़ कृषि भूमि दी जानी चाहिए, ताकि आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल हो सके।
सरकार की बढ़ती चुनौतियां
सरकार के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 फीसदी आरक्षण को वैध ठहराया है, लेकिन डीएनटी जैसे समुदायों के लिए अलग कोटा की मांग अदालती जांच का विषय बन सकती है। राज्य स्तर पर पहले ही आंदोलनकारियों को 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण देने जैसे कदम उठाए गए हैं, जैसे उत्तराखंड में हालिया कैबिनेट फैसला। लेकिन राजस्थान में विमुक्त समाज की मांगें इससे कहीं आगे हैं- नागरिक आय अधिकार यानी न्यूनतम मासिक आय सुनिश्चित करना, जो गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए क्रांतिकारी हो सकता है।
चुनावी प्रभाव और भविष्य की आशंका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन 2026 के विधानसभा चुनावों को प्रभावित करेगा। कांग्रेस की राज्य सरकार पर विपक्षी दलों ने पहले ही आरक्षण नीतियों पर सवाल उठाए हैं। यदि मांगें अनसुनी रहीं, तो जयपुर महापड़ाव के जरिए पूरे देश में यह मुद्दा गूंज सकता है। डीएनटी समाज की एकजुटता ने साबित कर दिया है कि उपेक्षित वर्ग अब चुप नहीं बैठेंगे। सरकार को अब संतुलित कदम उठाने होंगे, वरना सामाजिक अशांति बढ़ सकती है। यह संघर्ष न केवल आरक्षण का, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का है।
















