
राजस्थान हाईकोर्ट ने पारिवारिक संपत्ति विवादों पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि वयस्क और शादीशुदा बेटा या बेटी अपने पिता की अनुमति के बिना उनकी स्व-अर्जित संपत्ति (Self-Acquired Property) में नहीं रह सकते, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता को अपनी मेहनत की कमाई से बनाए गए घर में शांति से रहने का पूरा अधिकार है।
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क्या है मामला और कोर्ट की टिप्पणी?
कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि जब संपत्ति पिता ने खुद खरीदी या बनाई हो, तो वह उसके अनन्य स्वामी (Exclusive Owner) होते हैं। इसमें संतान का कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होता।
अदालत के फैसले की मुख्य बातें
- अनुमति अनिवार्य: यदि पिता नहीं चाहते, तो विवाहित संतान को उस घर में रहने का कोई कानूनी हक नहीं है। उन्हें केवल पिता की ‘सहनशीलता’ या ‘दया’ (Licence) पर वहां रहने दिया जा सकता है।
- शांति का अधिकार: कोर्ट ने माना कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने बुढ़ापे में शांति से रहने का अधिकार है और वे अपनी संतान द्वारा पैदा किए गए मानसिक तनाव या विवाद से सुरक्षा पाने के हकदार हैं।
- बेदखली की शक्ति: वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि संतान माता-पिता को परेशान करती है, तो उन्हें घर से बेदखल किया जा सकता है।
पैतृक बनाम स्व-अर्जित संपत्ति का अंतर
इस फैसले को समझने के लिए इन दो श्रेणियों को जानना जरूरी है:
- स्व-अर्जित संपत्ति: जो पिता ने अपनी नौकरी, व्यापार या बचत से खरीदी हो, इस पर पिता का पूर्ण नियंत्रण होता है और वे जिसे चाहें उसे वसीयत (Will) के जरिए दे सकते हैं।
- पैतृक संपत्ति (Ancestral Property): जो चार पीढ़ियों से चली आ रही हो, इसमें बच्चों का कानूनी हक जन्म से होता है, जिसे इस फैसले से प्रभावित नहीं किया गया है।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश उन बच्चों के लिए एक चेतावनी है जो पिता की संपत्ति पर अपना हक जताते हुए उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं कानून अब स्पष्ट रूप से ‘वृद्धों के संरक्षण’ की ओर झुका हुआ है।
















