अगर आपका पैसा SBI, PNB या HDFC बैंक के सेविंग्स खाते में है, तो अब हर महीने न्यूनतम बैलेंस की चिंता जरूरी हो गई है। शहरों में रहने वाले लाखों ग्राहक खाते में औसतन कम राशि रहने पर मासिक जुर्माने की मार झेल रहे हैं। ये नियम क्षेत्र के हिसाब से तय होते हैं और कमी की मात्रा पर चार्ज बढ़ता जाता है। ग्रामीण इलाकों में थोड़ी राहत है, लेकिन शहरी ब्रांचों में सख्ती चरम पर पहुंच गई है।

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नए नियमों का असर क्यों बढ़ा?
पिछले साल से बैंकों ने अपनी पॉलिसी कड़ी कर दी है। मेट्रो और बड़े शहरों की ब्रांचों में औसत मासिक बैलेंस 10,000 रुपये तक रखना पड़ सकता है। अगर औसत 50 प्रतिशत भी कम रह गया, तो फिक्स्ड शुल्क के साथ प्रतिशत आधारित पेनल्टी भी कट जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ये सीमा 1,000 से 5,000 रुपये तक होती है, लेकिन यहां भी नजरअंदाज करने पर 400-600 रुपये तक का नुकसान हो सकता है। विशेष रूप से प्राइवेट बैंक जैसे HDFC में मेट्रो ब्रांच का खाता रखने वाले ग्राहकों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है, जहां शून्य बैलेंस पर ही 450 रुपये का चार्ज लग जाता है।
SBI के ग्राहकों पर क्या बोझ?
देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई में नियम ब्रांच के प्रकार पर निर्भर करते हैं। शहरी क्षेत्रों में 3,000 से 10,000 रुपये का औसत बैलेंस जरूरी है। अगर कमी 50 से 75 फीसदी तक हुई, तो 10 से 20 रुपये फिक्स्ड प्लस अतिरिक्त प्रतिशत जोड़ा जाता है। ग्रामीण ब्रांचों में सीमा कम है, लेकिन छोटे व्यापारी और किसान भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। कई ग्राहक बताते हैं कि सालाना ये चार्जेस 200-300 रुपये निकल जाते हैं, जो छोटे खातों के लिए भारी पड़ते हैं।
PNB और HDFC में अंतर कैसा?
पंजाब नेशनल बैंक में शहरी खातों के लिए 2,000 से 5,000 रुपये की औसत राशि रखनी पड़ती है, जबकि ग्रामीण में 1,000 रुपये पर्याप्त माने जाते हैं। कमी होने पर अधिकतम 600 रुपये तक वसूला जा सकता है। दूसरी ओर HDFC जैसे प्राइवेट बैंक में मेट्रो शहरों के लिए 10,000 रुपये अनिवार्य हैं। सेमी-अर्बन ब्रांचों में ये 5,000 से 10,000 के बीच है और पेनल्टी 300 रुपये से शुरू होकर बढ़ती है। जीरो बैलेंस वाले विशेष खातों पर छूट मिलती है, लेकिन सामान्य सेविंग्स अकाउंट में लापरवाही महंगी साबित हो रही।
कैसे बचें इस फंदे से?
समाधान आसान हैं। सबसे पहले बैंक ऐप या एसएमएस अलर्ट से मासिक बैलेंस ट्रैक करें। ऑटो-स्वीप सुविधा लें, जिसमें अतिरिक्त पैसा खुद-ब-खुद फिक्स्ड डिपॉजिट में चला जाता है। जीरो बैलेंस या सैलरी अकाउंट चुनें, जहां ये नियम लागू ही नहीं होते। सीनियर सिटीजंस और स्टूडेंट्स को भी कई छूटें मिलती हैं। अगर ब्रांच शहरी है, तो ग्रामीण या सेमी-अर्बन शाखा में खाता ट्रांसफर करवाएं। नियमित रूप से स्टेटमेंट चेक करें और जरूरत पड़ने पर बैंक शाखा से बात करें।
ग्राहकों की क्या है शिकायत?
पंजाब जैसे राज्यों में छोटे व्यापारी और घरेलू महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान हैं। उनका कहना है कि ये चार्जेस बैंकिंग को बोझिल बना रहे हैं। कई संगठन इसकी शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुंचा रहे हैं। हालांकि बैंकों का तर्क है कि ये ऑपरेशनल खर्चे कवर करने के लिए जरूरी हैं। फिर भी ग्राहकों को सलाह है कि सटीक नियम अपनी ब्रांच से कन्फर्म करें, क्योंकि पॉलिसी कभी भी बदल सकती है। सजग रहें, तो ये जुर्माना आसानी से टाला जा सकता है।
















