भारतीय लोकतंत्र में आजादी के बाद से अब तक का सबसे बड़ा संसदीय बदलाव तैयारी के चरण में है। आने वाले दिनों में लोकसभा की संरचना में ऐसा बदलाव आ सकता है, जिससे सीटों की संख्या और महिला प्रतिनिधित्व दोनों में एक साथ बड़ी क्रांति देखी जाएगी। जानकारी के मुताबिक, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को धीरे‑धीरे बढ़ाकर लगभग 816 सीटें करने की दिशा में काम चल रहा है। इनमें से लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने की संभावना जताई जा रही है, जिससे लोकसभा में महिला सांसदों का अनुपात इतिहास में पहली बार 33 प्रतिशत के करीब तक पहुंच सकता है।

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महिला प्रतिनिधित्व में इतिहास की सबसे बड़ी छलांग
मौजूदा समय में लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या लगभग 70 के आसपास है, यानी कुल सीटों का लगभग 13-14 प्रतिशत। नई व्यवस्था में यह आंकड़ा लगभग ढाई गुना बढ़ सकता है, जो भारतीय राजनीति में महिला नेतृत्व के लिए एक बड़ा बदलाव माना जा सकता है। इसके लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम जैसे कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बुनियाद रखते हैं। हालांकि अब तक इस आरक्षण को जनगणना और परिसीमन के साथ जोड़कर लागू करने की बात की जा रही थी, लेकिन अब नई योजना यह है कि अगली जनगणना का इंतजार किए बिना भी महिला आरक्षण को लोकसभा और विधानसभा के लिए जल्द से जल्द लागू किया जाए।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम और परिसीमन का नया गठजोड़
इसके लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन और एक संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी चल रही है। इस व्यवस्था में 2011 की जनगणना को आधार बनाकर नया परिसीमन किया जाएगा, ताकि जनसंख्या के आधार पर नई सीटें बनाई जा सकें। उसी के साथ महिला आरक्षण को भी लागू करने का मकसद है ताकि लोकतंत्र के दोनों ही पहलू जनसांख्यिकी आधारित प्रतिनिधित्व और लैंगिक समानता एक साथ मजबूत हो सकें। इस ढांचे के तहत लोकसभा की सीटें 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बढ़ाई जाएंगी, और इन नई सीटों में से लगभग एक तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा।
राजनीतिक गणित पर पड़ने वाला असर
इस योजना का राजनीतिक प्रभाव काफी गहरा हो सकता है। बड़े राजनीतिक दलों को अपने चुनावी और नीति‑निर्माण एजेंडे में महिला नेतृत्व को और ज्यादा गंभीरता से लेना पड़ेगा, क्योंकि अब वे लगातार एक बड़े वर्ग की उम्मीदवारों को आरक्षित सीटों पर बैठाने के लिए तैयार रहने के लिए मजबूर होंगे। छोटे दलों को भी अपनी उम्मीदवार बनाने की नई जिम्मेदारी मिल सकती है, जबकि राज्य‑स्तर पर इससे सीटों के बँटवारे, नई राजनीतिक गठबंधन और चुनावी संरचना पर नए बहस शुरू हो सकते हैं।
2029 तक लोकसभा में नया चेहरा
शायद 2029 के लोकसभा चुनाव तक यह नई व्यवस्था पूरी तरह लागू हो चुकी हो, जिससे लोकसभा पहली बार 800 के आसपास की सदस्य‑संख्या और लगभग एक चौथाई से ज्यादा महिला सांसदों के साथ इतिहास में अपनी जगह बना सकती है। इस फेरबदल के जरिए न सिर्फ लोकतंत्र का आकार बदलेगा, बल्कि भागीदारी का चेहरा भी इस तरह से बदलेगा, जैसा आजादी के बाद कई दशकों में नहीं देखा गया।
















