
देशभर के प्रतिष्ठित जवाहर नवोदय विद्यालयों (JNV) में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के छात्रों को 10% आरक्षण का लाभ न मिलने पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है जस्टिस विशाल मिश्रा की एकल पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार और नवोदय विद्यालय समिति (NVS) को नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है, कोर्ट की इस सख्ती से शिक्षा मंत्रालय में हलचल तेज हो गई है।
Table of Contents
संविधान की अवहेलना पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विकास मिश्रा ने दलील दी कि वर्ष 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 15(6) जोड़ा गया था। इसके तहत सरकारी और निजी शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक रूप से पिछड़े मेधावी छात्रों के लिए 10 फीसदी कोटा अनिवार्य किया गया है। हैरानी की बात यह है कि केंद्र सरकार के ही अधीन आने वाले केंद्रीय विद्यालयों (KV) में यह आरक्षण लागू है, लेकिन नवोदय विद्यालयों की प्रवेश नीति से यह अब तक नदारद है।
कोर्ट ने पूछा- यह दोहरा मापदंड क्यों?
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार से पूछा है कि एक ही मंत्रालय के तहत आने वाले दो अलग-अलग स्कूली तंत्रों में आरक्षण के नियम अलग-अलग कैसे हो सकते हैं? याचिका में स्पष्ट किया गया कि नवोदय विद्यालय विशेष रूप से ग्रामीण और गरीब मेधावी छात्रों के लिए बनाए गए हैं, ऐसे में वहां EWS कोटे का न होना लाखों गरीब बच्चों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी 2026 के उस हालिया आदेश का भी जिक्र किया, जिसमें EWS वर्ग को समान अवसर न मिलने को एक गंभीर मुद्दा बताया गया था। 17 मार्च 2026 को हुई इस सुनवाई के बाद अब केंद्र सरकार के डिप्टी सॉलिसिटर जनरल को एक हफ्ते में स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
क्या होगा असर?
अगर कोर्ट का फैसला छात्रों के पक्ष में आता है, तो देशभर के 650 से अधिक नवोदय विद्यालयों में प्रवेश की प्रक्रिया बदल जाएगी। इससे उन मेधावी छात्रों को सीधा लाभ मिलेगा जो प्रतिभा के बावजूद गरीबी के कारण बेहतर शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।
















