
भारत सरकार ने स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वजन घटाने वाली दवाओं, विशेष रूप से ‘सेमाग्लूटाइड’ (Semaglutide) जैसे साल्ट्स के विज्ञापनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है, ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने साफ किया है कि ये दवाएं केवल डॉक्टर के पर्चे (Prescription) पर ही दी जा सकती हैं और इनका सार्वजनिक प्रचार नियमों का उल्लंघन है।
Table of Contents
सरकार ने क्यों उठाया यह सख्त कदम?
इस प्रतिबंध के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण बताए जा रहे हैं:
सुरक्षा और खुद से दवा लेने का खतरा (Self-Medication):
- अधिकारियों का मानना है कि विज्ञापनों को देखकर लोग बिना डॉक्टरी सलाह के इन दवाओं का सेवन शुरू कर देते हैं। चूंकि ये दवाएं हॉर्मोनल संतुलन और पाचन तंत्र पर असर डालती हैं, इसलिए बिना निगरानी के इनका उपयोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।
भ्रामक दावे और सरोगेट मार्केटिंग
- कई कंपनियां ‘हेल्थ अवेयरनेस’ या इन्फ्लुएंसर्स के माध्यम से परोक्ष रूप से अपनी दवाओं का प्रचार कर रही थीं विज्ञापन अक्सर इन दवाओं को “चमत्कारी” बताते हैं, जिससे लोग संतुलित आहार और व्यायाम जैसे प्राकृतिक तरीकों को नजरअंदाज करने लगते हैं।
पेटेंट समाप्ति और जेनेरिक दवाओं की होड़
- मार्च 2026 में कई प्रमुख वेट-लॉस दवाओं के पेटेंट खत्म हो रहे हैं। इसके बाद भारतीय कंपनियां इनके सस्ते जेनेरिक वर्जन बाजार में उतारेंगी। सरकार नहीं चाहती कि इस व्यावसायिक होड़ में कंपनियों के बीच विज्ञापनों की ऐसी प्रतिस्पर्धा शुरू हो जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाए।
इन्फ्लुएंसर्स पर भी रहेगी कड़ी नजर
नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, केवल टीवी या अखबार ही नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी इन दवाओं का प्रचार नहीं किया जा सकेगा। अगर कोई कंपनी या व्यक्ति ‘बीमारी के प्रति जागरूकता’ के बहाने किसी खास ब्रांड या दवा को प्रमोट करता पाया गया, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस फैसले का स्वागत किया है, उनका कहना है कि मोटापा एक जटिल बीमारी है और इसका इलाज केवल गोलियों या इंजेक्शन से संभव नहीं है, दवाओं का उपयोग केवल उन्हीं मरीजों के लिए होना चाहिए जिन्हें डॉक्टर इसकी सख्त जरूरत समझते हैं।
















