
तलाक के बाद पति की संपत्ति में पत्नी के अधिकार को लेकर समाज में कई भ्रांतियां हैं, लेकिन भारतीय कानून इस मामले में बहुत स्पष्ट है अधिकांश लोगों को लगता है कि तलाक होते ही पत्नी पति की आधी संपत्ति की हकदार हो जाती है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
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संपत्ति पर कोई स्वतः अधिकार नहीं
भारत में “कम्युनिटी प्रॉपर्टी” का नियम लागू नहीं होता है। इसका मतलब है कि तलाक के बाद पत्नी को पति की संपत्ति में स्वतः 50% हिस्सा नहीं मिलता संपत्ति का मालिकाना हक इस बात पर निर्भर करता है कि वह किसके नाम पर पंजीकृत है।
स्वयं अर्जित बनाम पैतृक संपत्ति
- स्वयं अर्जित (Self-acquired): यदि संपत्ति केवल पति के नाम पर है, तो पत्नी उस पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकती। हालांकि, यदि पत्नी ने उस संपत्ति को खरीदने में आर्थिक योगदान दिया है, तो वह अपना हिस्सा मांग सकती है।
- पैतृक संपत्ति (Ancestral Property): तलाक के बाद पत्नी का पति की पैतृक संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार नहीं रह जाता है।
भरण-पोषण और गुजारा भत्ता (Alimony)
भले ही पत्नी का संपत्ति पर सीधा मालिकाना हक न हो, लेकिन वह अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए गुजारा भत्ता (Alimony) की हकदार होती है:
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24: मुकदमे के दौरान अंतरिम भरण-पोषण के लिए।
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25: स्थायी गुजारा भत्ता और भरण-पोषण के लिए।
- CRPC की धारा 125: पति अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।
- कोर्ट का मानक: सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, पति के शुद्ध वेतन का 25% हिस्सा गुजारा भत्ता के रूप में एक “उचित” राशि माना जा सकता है।
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अन्य महत्वपूर्ण अधिकार
- विवाह के समय उपहार में मिले जेवर, नकदी या सामान पर केवल पत्नी का अधिकार होता है और तलाक के बाद पति को इसे वापस करना पड़ता है।
- सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, पत्नी को अपने वैवाहिक घर (Matrimonial Home) में रहने का अधिकार है, भले ही वह उसके नाम पर न हो।
- माता-पिता के तलाक के बाद भी बच्चों का पिता की संपत्ति पर अधिकार बना रहता है।
तलाक के बाद पत्नी को संपत्ति में हिस्सा नहीं, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य के लिए वित्तीय सहायता (गुजारा भत्ता) और रहने का अधिकार मिलता है।
















