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Divorce Law: पति किन आधारों पर ले सकता है तलाक? जानें क्या कहता है कानून

साधारण पति को तलाक मिलना आसान नहीं। कानून सख्त है, लेकिन ये 7 आधार अपनाओ तो जीत निश्चित। क्रूरता, व्यभिचार से लेकर ब्रेकडाउन तक पूरी जमानत जान लो। एक गलती और जिंदगी भर का दर्द!

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वैवाहिक जीवन में दरार आने पर तलाक एक कठिन लेकिन कभी कभी अनिवार्य कदम बन जाता है। भारत का कानून पतियों को तलाक के लिए स्पष्ट आधार देता है, लेकिन ये आधार सख्ती से लागू होते हैं। हिंदू कानून से लेकर अन्य व्यक्तिगत कानूनों तक हर व्यवस्था में पति को ठोस सबूत जुटाने पड़ते हैं। आइए समझते हैं इन आधारों को विस्तार से।

Divorce Law: पति किन आधारों पर ले सकता है तलाक? जानें क्या कहता है कानून

हिंदू विवाह अधिनियम के सामान्य आधार

हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध परिवारों में हिंदू विवाह अधिनियम 1955 प्रमुख कानून है। इसकी धारा 13 पतियों के लिए कई आधार खोलती है। सबसे पहले व्यभिचार, जहां पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक संबंध साबित हो। अदालतें इसके लिए गवाह, चैट या अन्य प्रमाण स्वीकार करती हैं। दूसरा क्रूरता, जो शारीरिक हिंसा या लगातार मानसिक प्रताड़ना हो सकती है। यदि पत्नी का व्यवहार सामान्य जीवन को असंभव बना दे, तो ये मजबूत दावा बनता है।

तीसरा परित्याग, मतलब पत्नी बिना वजह दो साल से ज्यादा पति को छोड़ दे। चौथा धर्मांतरण, जब पत्नी हिंदू धर्म छोड़ ले। स्वास्थ्य आधारों में असाध्य मानसिक बीमारी, कुष्ठ रोग या गंभीर यौन संक्रमण शामिल हैं, जो वैवाहिक संबंध बनाए रखना नामुमकिन कर दें। ये सभी आधार पति और पत्नी दोनों के लिए समान हैं।

आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया

सबसे तेज तरीका है आपसी सहमति तलाक। धारा 13बी के तहत पति पत्नी एक साथ याचिका दायर कर सकते हैं। शादी के एक साल बाद अलग रहना जरूरी है। अदालत छह महीने की प्रतीक्षा के बाद मंजूरी देती है। इस दौरान गुजारा भत्ता और संपत्ति बंटवारा तय हो जाता है। ये प्रक्रिया कम विवाद वाली होती है।

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मुस्लिम और अन्य व्यक्तिगत कानून

मुस्लिम पर्सनल लॉ में पति को तलाक का अधिकार मिला है। वह लिखित नोटिस देकर प्रक्रिया शुरू कर सकता है, लेकिन एक साथ तीन तलाक अब गैरकानूनी है। इद्दत काल और भरण पोषण के नियम लागू होते हैं। ईसाई और पारसी कानूनों में भी व्यभिचार और क्रूरता मुख्य आधार हैं। अंतर धर्म विवाहों के लिए विशेष विवाह अधिनियम समान प्रावधान देता है।

सुप्रीम कोर्ट के नए नजरिए

हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने विवाह के अपरिवर्तनीय ब्रेकडाउन को आधार बनाया है। यदि रिश्ता पूरी तरह टूट चुका हो और कोई सुधार संभव न हो, तो कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 से तलाक दे सकता है। लंबे समय का अलगाव भी अब मजबूत तर्क माना जाता है। ये फैसले पतियों के लिए लचीलापन लाते हैं।

तलाक प्रक्रिया और सावधानियां

तलाक याचिका फैमिली कोर्ट में दायर होती है। प्रक्रिया में मध्यस्थता अनिवार्य है। सबूत जुटाना सबसे बड़ा चैलेंज है। पति को बच्चों की हिरासत, भरण पोषण और संपत्ति के दावों का सामना करना पड़ सकता है। झूठे आरोपों से बचने के लिए वकील की सलाह लें। मध्यस्थता केंद्र पहले आजमाएं, अदालत आखिरी रास्ता हो।

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info@ortpsa.in

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