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बुजुर्गों के हक में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! बच्चों से विवाद होने पर घर से नहीं निकाला जा सकता, जानें अपने कानूनी अधिकार

बच्चों से झगड़ा हो तो भी माता-पिता का घर पर पूरा हक! हाईकोर्ट ने बेटे-बहू को फटकार लगाई। संपत्ति चाहिए तो सेवा करो, वरना बेदखल। बुजुर्गों के ये कानूनी हथियार जान लो।

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पारिवारिक विवादों के दौर में बुजुर्गों के लिए एक ऐतिहासिक राहत वाला फैसला आया है। झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि बच्चों से मतभेद होने पर भी माता-पिता को उनके खुद के घर से बाहर नहीं निकाला जा सकता। एक जिले में 75 साल के बुजुर्ग दंपति ने बेटे-बहू के उत्पीड़न के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने न सिर्फ उन्हें घर वापस लौटने का आदेश दिया, बल्कि जिला प्रशासन के पूर्व फैसले को पूरी तरह पलट दिया। जस्टिस ने कहा कि जीवनभर की मेहनत से बनी संपत्ति पर बुजुर्गों का पहला हक है। अगर बच्चे इसका लाभ लेना चाहते हैं तो बुजुर्गावस्था में सेवा करना उनकी जिम्मेदारी है।

बुजुर्गों के हक में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! बच्चों से विवाद होने पर घर से नहीं निकाला जा सकता, जानें अपने कानूनी अधिकार

यह मामला रामगढ़ क्षेत्र का है जहां बुजुर्ग जोड़े ने बताया कि बेटा संपत्ति पर कब्जा जमाकर उन्हें दर-दर भटकने पर मजबूर कर रहा था। प्रशासन ने शुरू में बेदखली का आदेश जारी किया लेकिन हाईकोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कानूनी ढांचे का हवाला दिया। वरिष्ठ नागरिक संरक्षण अधिनियम के तहत बुजुर्गों को न केवल घर में रहने का अधिकार है बल्कि रखरखाव और सुरक्षा की गारंटी भी। कोर्ट ने जोर दिया कि पारिवारिक झगड़े संपत्ति के मूल मालिक के अधिकार को कम नहीं कर सकते। अगर बच्चे कर्तव्य भूल जाते हैं तो माता-पिता संपत्ति हस्तांतरण को रद्द भी करवा सकते हैं। यह फैसला सामाजिक बदलाव की बयार में बेहद जरूरी है।

परिवर्तनशील समाज में बुजुर्गों की असुरक्षा

आज के दौर में शहरीकरण ने परिवारों को बिखेर दिया है। नौकरी के चक्कर में युवा माता-पिता को छोड़कर दूर चले जाते हैं। संपत्ति के लालच में कई बार बेटे-बहू बुजुर्गों को घर से निकाल देते हैं। हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों में साफ रेखा खींची है। बुजुर्गों का घर पर प्राथमिक अधिकार बना रहेगा चाहे विवाद कितना भी गहरा हो। अधिनियम की धारा के मुताबिक मासिक भरण-पोषण सुनिश्चित करना बच्चों का कर्तव्य है। अगर प्रताड़ना हो तो जिला मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराई जा सकती है और 90 दिनों में फैसला मिलना चाहिए। यह प्रावधान बुजुर्गों को आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा देता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम पारिवारिक बंधनों को मजबूत करेगा।

पिछले फैसलों से सबक

देशभर में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां अदालतों ने बुजुर्गों के पक्ष में फैसले दिए। राजस्थान की अदालत ने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि आने वाले दशकों में बुजुर्गों की तादाद युवाओं से ज्यादा हो जाएगी। इसलिए वृद्धाश्रमों की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि हर मामले में बच्चों को घर से निकालना जरूरी नहीं प्रत्येक स्थिति की अलग जांच होनी चाहिए। झारखंड का यह फैसला इनसे अलग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सेवा और संपत्ति को सीधे जोड़ता है। अगर बच्चे जिम्मेदारी न निभाएं तो कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुला है।

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बुजुर्गों के व्यावहारिक अधिकार

बुजुर्गों को क्या करना चाहिए अगर ऐसा विवाद हो। सबसे पहले स्थानीय तहसीलदार या एसडीएम से संपर्क करें। मेडिकल रिपोर्ट या गवाहों के बयान मजबूत सबूत बन सकते हैं। घरेलू सहायता मांगें या गुजारा भत्ता तय करवाएं। अगर बच्चे विदेश में हैं तो वीडियो के जरिए सुनवाई का प्रावधान है। कानूनी सहायता के लिए वकीलों से सलाह लें। सामाजिक संगठन भी मददगार साबित हो सकते हैं। सरकार ने पेंशन और स्वास्थ्य योजनाएं शुरू की हैं लेकिन जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। हेल्पलाइन नंबरों का प्रचार हो ताकि बुजुर्ग अकेले न पड़े।

नई उम्मीद की किरण

यह फैसला न केवल कानूनी जीत है बल्कि नैतिक संदेश भी। बच्चों को याद दिलाता है कि माता-पिता का आशीर्वाद संपत्ति से कहीं ऊपर है। विवाद सुलझाने के लिए काउंसलिंग सेंटर बढ़ें और परिवार बचें। बुजुर्ग अब डरकर नहीं बल्कि अधिकारों के साथ जी सकेंगे। समाज को इस दिशा में सोचना होगा ताकि बुढ़ापा अभिशाप न बने। 

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info@ortpsa.in

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