भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं, जहां एक एकड़ की वैल्यू करोड़ों में पहुंच गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि केंद्र सरकार के बाद देश की सबसे विशाल भूमि संपदा किसके कब्जे में है? आश्चर्यजनक रूप से यह कोई टाटा, अंबानी या कोई बड़ा उद्योगपति नहीं, बल्कि कैथोलिक चर्च ऑफ इंडिया है। इसके नाम पर 17 करोड़ एकड़ से ज्यादा जमीन दर्ज है, जो आम लोगों को हैरान कर देती है।

Table of Contents
सरकारी संपत्ति का विस्तार
भारत सरकार देश का सबसे बड़ा जमींदार बनी हुई है। उसके पास करीब 15,531 वर्ग किलोमीटर भूमि फैली हुई है, जो 51 केंद्रीय मंत्रालयों और दर्जनों सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के बीच बंटी हुई है। इसमें रक्षा मंत्रालय की छावनियां, रेलवे के ट्रैक और स्टेशन, सड़क परियोजनाएं, बांध और एयरपोर्ट शामिल हैं। कुल मिलाकर यह क्षेत्रफल कई छोटे देशों से भी बड़ा है, जैसे कतर या सिंगापुर। रेल मंत्रालय के पास ही सबसे ज्यादा 2,926 वर्ग किलोमीटर जमीन है, उसके बाद रक्षा का नंबर आता है।
कैथोलिक चर्च का अप्रत्याशित दबदबा
सरकार के ठीक बाद दूसरे नंबर पर कैथोलिक चर्च ऑफ इंडिया विराजमान है। ब्रिटिश काल के इंडियन चर्च एक्ट 1927 के तहत इसे मिली यह संपत्ति पूरे देश में फैली हुई है। इसमें हजारों चर्च, स्कूल, अस्पताल, कॉलेज और अनाथालय शामिल हैं। अनुमान है कि 7 करोड़ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र इसके नियंत्रण में है, जिसका बाजार मूल्य 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर है। यह आंकड़ा गैर-सरकारी संस्थाओं में सबसे ऊपर है, हालांकि आधिकारिक सत्यापन की कमी इसे विवादास्पद बनाती है। चर्च इस जमीन का उपयोग सामाजिक सेवाओं के लिए करता है, लेकिन इसकी विशालता पर सवाल उठते रहते हैं।
अन्य बड़े मालिक संस्थाएं
तीसरे स्थान पर वक्फ बोर्ड है, जिसके पास 9.4 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन पर 8.7 लाख संपत्तियां हैं। ये मुख्यतः मस्जिदें, मदरसे, कब्रिस्तान और दान की गई जमीनें हैं, जिनका मूल्य 1.2 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। रक्षा मंत्रालय के पास 17.99 लाख एकड़ क्षेत्र छावनियों, फायरिंग रेंज और ट्रेनिंग ग्राउंड के रूप में है। भारतीय रेलवे 4.90 लाख हेक्टेयर जमीन का मालिक है, जो ट्रैक, स्टेशन और कॉलोनियों में बंटी हुई है। कोयला, ऊर्जा और शिपिंग मंत्रालय भी बड़े भू-मालिक हैं।
विवाद और पारदर्शिता की मांग
ये आंकड़े सरकारी रिपोर्ट्स और विभिन्न अध्ययनों पर आधारित हैं, लेकिन धार्मिक संस्थाओं की जमीनों पर पारदर्शिता की कमी चर्चा का विषय बनी हुई है। निजी उद्योगपतियों से कहीं आगे सरकारी और धार्मिक संस्थाएं हैं, जो आर्थिक और सामाजिक संरचना पर सवाल खड़े करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और सर्वे से इन संपत्तियों का सही हिसाब हो सकेगा। आम जनता के लिए यह खुलासा चौंकाने वाला है कि इतनी बड़ी संपदा कुछ चुनिंदा हाथों में केंद्रित है।
इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भारत की जमीन का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक हित में उपयोग हो रहा है, लेकिन बेहतर प्रबंधन की जरूरत है। क्या आप तैयार हैं इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए?
















