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Land Records: भारत में सरकार के बाद किसके पास है सबसे ज्यादा जमीन? जानकर रह जाएंगे दंग

भारत सरकार के पास 15,531 वर्ग किमी जमीन है, लेकिन उसके बाद कैथोलिक चर्च के पास 17 करोड़ एकड़! वक्फ बोर्ड और उद्योगपति पीछे। यह चौंकाने वाला खुलासा भूमि रिकॉर्ड की जटिलताओं को उजागर करता है। पारदर्शिता जरूरी!

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भारत का कुल क्षेत्रफल 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है, जहां जमीन न सिर्फ आर्थिक संपत्ति का प्रतीक है बल्कि सामाजिक और धार्मिक महत्व भी रखती है। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि केंद्र सरकार सबसे बड़ा भूमि मालिक है। उसके पास करीब 15,531 वर्ग किलोमीटर जमीन दर्ज है, जो रेलवे, रक्षा, कोयला जैसे मंत्रालयों में बंटी हुई है। लेकिन सवाल यह है कि सरकार के बाद दूसरा सबसे बड़ा मालिक कौन है? चौंकाने वाली बात यह है कि यह कोई उद्योगपति या कॉर्पोरेट घराना नहीं, बल्कि कैथोलिक चर्च ऑफ इंडिया है। अनुमान है कि चर्च के पास 17 करोड़ एकड़ से अधिक जमीन है, जो देशभर में फैली हुई है।

Land Records: भारत में सरकार के बाद किसके पास है सबसे ज्यादा जमीन? जानकर रह जाएंगे दंग

सरकारी भूमि की ताकत

भारत सरकार की जमीन का सबसे बड़ा हिस्सा रेल मंत्रालय के पास है, जहां ट्रैक, स्टेशन और गोदाम शामिल हैं। रक्षा मंत्रालय के पास सैन्य ठिकाने, एयरबेस और नौसेना बेस हैं। कोयला और ऊर्जा मंत्रालय भी हजारों वर्ग किलोमीटर पर कब्जा रखते हैं। कुल मिलाकर यह क्षेत्रफल सिंगापुर या कतर जैसे देशों से बड़ा है। गवर्नमेंट लैंड इनफॉर्मेशन सिस्टम (GLIS) जैसे पोर्टल इन आंकड़ों को ट्रैक करते हैं, लेकिन रखरखाव और अतिक्रमण की चुनौतियां बरकरार हैं। ये संपत्तियां देश की विकास योजनाओं की रीढ़ हैं।

चर्च का गुप्त साम्राज्य

कैथोलिक चर्च ऑफ इंडिया सरकारी स्वामित्व के बाद नंबर दो पर है। उसके पास शिक्षा, स्वास्थ्य और चैरिटी संस्थानों के नाम पर करोड़ों हेक्टेयर जमीन है। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और चर्च परिसर इसी संपत्ति का हिस्सा हैं। इसकी अनुमानित कीमत एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जाती है। न तो टाटा या अंबानी जैसे बिजनेसमैन और न ही DLF या गोदरेज परिवार इस स्तर पर पहुंच पाए हैं। चर्च की यह संपत्ति सदियों पुरानी है और कर नियमों में छूट पाती है।

अन्य प्रमुख मालिक

वक्फ बोर्ड भी लाखों एकड़ जमीन का मालिक है, जो मस्जिदों, कब्रिस्तानों और सामाजिक कार्यों के लिए इस्तेमाल होती है। निजी क्षेत्र में रियल एस्टेट कंपनियां जैसे DLF और गोदरेज हजारों एकड़ पर हैं, लेकिन संस्थागत स्वामित्व से पीछे। उद्योगपतियों के नाम पर कुछ हिस्से हैं, पर ये कुल मिलाकर छोटे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वामित्व योजना जैसे प्रयास जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल बना रहे हैं।

पारदर्शिता की जरूरत

ये आंकड़े भूमि रिकॉर्ड की जटिलताओं को उजागर करते हैं। ड्रोन सर्वे और GLIS जैसे कदम सकारात्मक हैं, लेकिन विवाद और अतिक्रमण आम हैं। सरकार को सभी स्वामित्वों पर नजर रखनी चाहिए। क्या यह संपत्ति विकास के लिए इस्तेमाल हो सकती है? बहस जारी है। पारदर्शी रिकॉर्ड से किसानों और नागरिकों को फायदा होगा।

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Author
info@ortpsa.in

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