देश की युवा शक्ति शिक्षा पूरी करने के बाद भी नौकरी के लिए भटक रही है। हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि 20 से 29 साल के लगभग 6.3 करोड़ ग्रेजुएट्स में से 1.1 करोड़ पूरी तरह बेरोजगार हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 15 से 25 साल के युवाओं में बेरोजगारी की दर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। बेरोजगारी पंजीकरण के एक साल बाद भी केवल 7 प्रतिशत को ही स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पा रही है। यह स्थिति न केवल अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है, बल्कि समाज की नींव को भी हिला रही है।

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आंकड़ों का काला सच
रिपोर्ट्स बताती हैं कि युवा व्हाइट कॉलर नौकरियों की दौड़ में हैं, लेकिन ब्लू कॉलर क्षेत्रों में कुशल श्रमिकों की भारी किल्लत है। ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी 42 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि जनवरी 2026 में कुल बेरोजगारी दर 5 प्रतिशत हो गई। महिलाओं की हालत और खराब है। शहरी क्षेत्रों में उनकी बेरोजगारी पुरुषों से दोगुनी यानी 25.7 प्रतिशत है। कुल मिलाकर, आबादी का 45 प्रतिशत अभी भी कृषि पर निर्भर है, जो मौसमी और कम आय वाली नौकरियां देती है।
मुख्य कारण क्या हैं?
उच्च शिक्षा के बावजूद व्यावहारिक कौशल की कमी बड़ी समस्या है। स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने विनिर्माण व डेटा एंट्री जैसे क्षेत्रों में 69 प्रतिशत नौकरियों को जोखिम में डाल दिया है। जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक मंदी और गैर कृषि रोजगारों का अभाव ने संकट को गहरा कर दिया। युवा अक्सर अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरियों को स्वीकार नहीं करते, जिससे कुशलता का मेलचंद नहीं हो पा रहा।
सामाजिक व आर्थिक असर
यह बेरोजगारी गरीबी, आय असमानता और युवाओं में हताशा को जन्म दे रही है। ग्रामीण युवा शहरों का रुख कर रहे हैं, लेकिन वहां भी सीमित अवसर मिल रहे हैं। सामाजिक अस्थिरता बढ़ रही है और विकास की गति धीमी पड़ रही है। बजट 2026 में रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान की जरूरत है, क्योंकि मौजूदा विकास दर अपर्याप्त साबित हो रही है।
रास्ता निकालने के उपाय
पुनर्कौशल प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा और गैर कृषि क्षेत्रों में निवेश जरूरी है। उद्योगों व शिक्षा संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी से कौशल अंतर कम हो सकता है। स्किल विकास योजनाओं को प्रभावी बनाना होगा ताकि युवाओं को बाजार के अनुकूल बनाया जा सके। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट देश के भविष्य को निगल जाएगा।
















